Friday, 14 August 2020

शारीरिक और मानसिक तप के जरीये आत्मा की शुद्धि का पर्व है पर्युषण काल, श्वेतांबर में 8 दिन जबकि दिगंबर समाज में 10 दिन का होता है ये महापर्व



भाद्रपद महीने में जैन धर्म के श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय के लोग पर्युषण पर्व मनाते हैं। जैन धर्म में इस पर्व का महत्व दिवाली की तरह ही है। इसे क्षमावाणी पर्व, दशलक्षण पर्व और संवत्सरी भी कहा जाता है। श्वेतांबर जैन समाज में 8 दिनों के इस पर्व की शुरुआत 15 अगस्त से हो रही है। वहीं दिगंबर जैन समाज में ये पर्व 22 अगस्त से शुरू होगा। ये पर्व भगवान महावीर के मूल सिद्धांत अहिंसा परमो धर्म पर चलना सिखाता है। इन दिनों में त्याग और संयम के साथ शारीरिक और मानसिक तप से आत्मशुद्धि की जाती है। माना जाता है इससे मोक्ष मिलता है।

श्वेतांबर में 8 दिन जबकि दिगंबर समाज में 10 दिन का पर्व
श्वेतांबर समाज 8 दिन तक पर्युषण पर्व मनाते हैं जबकि दिगंबर 10 दिन तक मनाते हैं। जिसे दसलक्षण कहते हैं। ये दस लक्षण – क्षमा, मार्दव, आर्नव, सत्य, संयम, शौच, तप, त्याग, आकिंचन्य एवं ब्रह्मचर्य हैं। इन दिनों जैन संतों के लिए 5 कर्तव्य भी बताए गए हैं। जो कि – संवत्सरी, प्रतिक्रमण, केशलोचन, तपश्चर्या, आलोचना और क्षमा-याचना है। पर्युषण पर्व के पूरा होने पर विश्व-मैत्री दिवस यानी संवत्सरी पर्व मनाया जाता है। इस पर्व के आखिरी दिन श्वेतांबर जैन समाज के लोग मिच्छामि दुक्कड़म् कहते हुए सभी से मन, वचन और कर्मो से जाने-अनजाने में हुई गलतियों की क्षमा मांगते हैं। दिगंबर संप्रदाय में इसे उत्तम क्षमा कहा जाता है।

पर्युषण: मुनि धर्म के संस्कार पैदा करने का पर्व
जैन समाज का पर्युषण काल मुनि धर्म के संस्कार डालने की प्रायोगिक पाठशाला है। ये संस्कारों को पैदा करने का पर्व है। इन दिनों में जैन समाज के लोग पूरी तरह अनुशासन में रहकर तप करते हैं। गर्म पानी पीते हैं, चटाई पर सोते हैं और कई लोग इन दिनों तप में लीन होकर अपने व्यापार का त्याग भी कर देते हैं। इस तरह के अन्य कड़े नियमों में रहते हुए शारीरिक और मानसिक तप से आत्मशुद्धि होती है और मुनि संस्कारों का जन्म होता है।

मांगते हैं गलतियों की क्षमा
1. पर्युषण शब्द में परि का अर्थ चारों ओर और उषण का अर्थ धर्म की आराधना होता है।
2. यह पर्व महावीर स्वामी के मूल सिद्धांत अहिंसा परमो धर्म, जिओ और जीने दो की राह पर चलना सिखाता है।
3. पर्युषण के 2 भाग हैं- पहला तीर्थंकरों की पूजा, सेवा और स्मरण तथा व्रतों के माध्यम से शारीरिक, मानसिक व वाचिक तप में स्वयं को पूरी तरह समर्पित करना।
4. श्वेतांबर समाज 8 दिन तक पर्युषण पर्व मनाते हैं जिसे ‘अष्टान्हिका’ कहते हैं जबकि दिगंबर 10 दिन तक मनाते हैं जिसे वे ‘दसलक्षण’ कहते हैं।
5. पर्युषण के समापन पर ‘विश्व-मैत्री दिवस’ मनाया जाता है। अंतिम दिन दिगंबर ‘उत्तम क्षमा’ तो श्वेतांबर ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहते हुए लोगों से क्षमा मांगते हैं।

Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today


Paryushan is a festival of purification of the soul through physical and mental austerity, 8 days in Shwetambara and 10 days in Digambar society.

from Dainik Bhaskar
https://ift.tt/2PWr2bU

No comments:

Post a Comment

कैसे तोड़ें ? - मन और जगत के बंधन को || How to break the bond between mind and world?

श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम जय जय राम  सच्चिदानंद भगवान की जय। सनातन धर्म की जय।  अभी-अभी आप बहुत सुंदर कथा सुन रहे थे। मेरे क...