Friday, 14 August 2020

दुर्योधन ने छल और गलत तरीके से पांडवों से छीन ली थी उनकी धन-संपत्ति, लेकिन ये संपत्ति उसके पास टिक ना सकी, अधर्म से कमाया गया धन टिकता नहीं है



महाभारत में कौरव और पांडवों की कथा के माध्यम से बताया गया है कि हमें सुखी और सफल जीवन के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। इस ग्रंथ में धृतराष्ट्र और विदुर के संवाद हैं। इन संवादों में विदुर ने कई ऐसी नीतियां बताई गई हैं, जिनका ध्यान रखने पर हम कई परेशानियों से बच सकते हैं। एक नीति में विदुर कहते हैं कि-

श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भात् सम्प्रवर्धते।

दाक्ष्यात्तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठत्ति।।

ये उद्योगपर्व के 35 वें अध्याय का 44 वां श्लोक है। इस श्लोक में चार बातें बताई गई हैं, जो धन से संबंधित हैं। पहली बात ये है कि अच्छे कर्म से ही स्थाई धन मिलता है। दुर्योधन ने छल और गलत तरीके से पांडवों से उनकी धन-संपत्ति छीन ली थी, लेकिन ये धन-संपत्ति उसके पास टिक नहीं। इसका मतलब यही है कि अधर्म से कमाया गया धन टिकता नहीं है।

इस श्लोक के अनुसार दूसरी बात ये है कि धन का प्रबंधन यानी निवेश सोच-समझकर करना चाहिए। दुर्योधन ने पांडवों को नष्ट करने के लिए धन खर्च किया था, गलत नियत के साथ किए गए काम से वह खुद नष्ट हो गया। धन का निवेश सही जगह करेंगे तब ही लाभ मिल सकता है।

तीसरी बात ये है कि बुरे समय में बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए। महाभारत में पांडव दुर्योधन से सबकुछ हार गए थे, इसके बाद अभावों में रहते हुए भी उन्होंने बुद्धिमानी से योजना बनाते हुए विशाल सेना खड़ी कर ली थी।

विदुर के चौथी बात में बताया है कि धन के मामले में धैर्य बनाए रखना चाहिए। धन आने पर बुरी आदतों से बचना चाहिए। युधिष्ठिर अपनी गलत आदत द्युत क्रीड़ा (जुआ) में ही दुर्योधन और शकुनि से सब कुछ हार गए थे। इसीलिए जब हमारे पास धन आए तो बुरे कामों से बचना चाहिए, वरना सबकुछ खत्म हो सकता है।

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