कबीरदासजी ने एक दोहे में कहा है कि अजहूँ तेरा सब मिटै, जो मानै गुरु सीख। जब लग तू घर में रहैं, मति कहुँ माँगे भीख।। इस दोहे का अर्थ यह है कि अगर कोई व्यक्ति सतगुरु के उपदेश को सूने और मान ले तो उसकी सभी परेशानियां आज ही खत्म हो जाएगी। जब तक कोई व्यक्ति गृहस्थ है, उसे भिक्षा नहीं मांगनी चाहिए। कर्म करके परिवार का पालन करना चाहिए, तभी मान-सम्मान मिलता है। इस बात का महत्व एक लोक कथा से समझ सकते हैं।
प्रचलित लोक कथा के अनुसार पुरानी समय में किसी गांव में एक गरीब संत थे, उनके जीवन में कई परेशानियां थीं। कभी-कभी उन्हें और उनकी पत्नी को पूरे-पूरे दिन भूखे रहने पड़ता था। गांव के सभी लोग संत का बहुत सम्मान करते थे, लेकिन संत इतने स्वाभिमानी थे कि वे किसी से दान नहीं लेते थे।
उस राज्य के राजा को ये बात मालूम हुई तो उन्होंने सोचा कि संत की मदद करनी चाहिए। राजा ने अपने संत के बहुत सारा धन और अनाज तुरंत भिजवा दिया। उस संत घर पर नहीं थे। राजा का भिजवाया हुआ धन और अनाज देखकर संत की पत्नी ने सोचा कि अब उनके बुरे दिन दूर हो जाएंगे। कुछ देर बाद जब संत घर आए तो उन्हें मालूम हुआ कि राजा ने उन्हें दान दिया है।
संत तुरंत ही राजमहल पहुंचे और राजा का दिया हुआ दान लौटा दिया। संत ने राजा से कहा कि मैं ये दान स्वीकार नहीं कर सकता। मुझे जो आनंद खुद के कमाए हुए धन से मिलता है, वह दान में मिले पैसों से नहीं मिल सकता। इसीलिए कृपया ये सामान आप वापस ले लीजिए। राजा संत के स्वाभिमान से बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें अपने राज दरबार की सेवा में नियुक्त कर दिया।
प्रसंग की सीख
इस प्रसंग की सीख यह है कि व्यक्ति को स्वाभिमानी होना चाहिए। दान से वह आनंद नहीं मिलता है, जो खुद की मेहनत से कमाए धन से मिलता है। खुद की मेहनत से कमाया गया धन बहुत कीमती होता है।
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