पूजा-पाठ करते समय हमें भगवान के सामने किसी तरह की शर्त नहीं रखनी चाहिए। निस्वार्थ भाव से की गई पूजा ही श्रेष्ठ मानी जाती है। जीवन में जो भी कुछ मिल रहा है, उसे भगवान का आशीर्वाद मानकर स्वीकार करना चाहिए और संतुष्ट रहना चाहिए। यही जीवन में सुख और शांति बनाए रखने का मूल मंत्र है। इस संबंध में एक लोक कथा प्रचलित है।
कथा के अनुसार पुराने समय में एक राजा के सेवा में एक नया सेवक नियुक्त हुआ। राजा बहुत ही विद्वान था और अपनी आसपास के सभी लोगों का ध्यान रखता था। राजा ने नए सेवक से पूछा तुम्हारा नाम क्या है? सेवक ने जवाब दिया कि महाराज जिस नाम से आप बुलाएंगे, वही मेरा नाम होगा।
राजा ने फिर पूछा कि तुम्हें खाने में क्या पसंद है?
सेवक बोला कि राजन् जो आप भी कुछ खाने के लिए देंगे, वही मैं खुशी-खुशी खा लूंगा।
राजा ये जवाब सुनकर हैरान हुआ। उसने फिर पूछा तुम्हें किस तरह के वस्त्र पहनना पसंद हैं?
सेवक ने कहा कि महाराज आप जो भी वस्त्र देंगे, मैं खुशी-खुशी धारण कर लूंगा।
राजा ने अंतिम प्रश्न पूछा कि तुम्हारी इच्छा क्या है?
सेवक ने कहा कि महाराज एक सेवक की कोई इच्छा नहीं होती है। मालिक जैसे रखता है, उसे वैसे ही रहना पड़ता है।
ये बात सुनकर राजा प्रसन्न हो गया। उसने सेवक से कहा कि आज तुमने मुझे बहुत बड़ी सीख दी है। अगर हम भक्ति करते हैं तो भगवान के सामने किसी तरह की शर्त या इच्छा नहीं रखनी चाहिए। तुमने मुझे बता दिया है कि भगवान के भक्त को कैसा होना चाहिए।
प्रसंग की सीख
भक्ति हमेशा निस्वार्थ भाव से करनी चाहिए और जीवन में जो भी कुछ मिलता है, उसके लिए भगवान का आभार मानना चाहिए। हर हाल में संतुष्ट रहना चाहिए।
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